शनिवार, 9 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 July 2016


🔴 अंतरात्मा में यदि किसी दिव्य वाणी को सुनने की शक्ति हो तो अपने  भीतर बैठा हुआ कोई ‘नैतिक’ यह कहते हुए पाया जायेगा कि जो सुख-साधन समाज के अनुग्रह से मिले हैं, उन्हें लूट का माल न समझा जाय, ऋण माना जाय और उसका प्रतिदान चुकाया जाय। यदि इस आत्मा की पुकार को न सुना जाय तो उसका प्रतिफल यह होगा कि ऋणग्रस्तों की तरह अपना अंतःकरण भारी होता चला जाएगा और उस उल्लास की अनुभूति न हो सकेगी, जो जीवन देवता के अनुग्रह से हर घड़ी होती रहनी चाहिए।

🔵 अपने साथ पक्षपात की आदत से प्रायः सभी लोग घिरे रहते हैं। दूसरों की आलोचना करने के लिए काफी तथ्य संग्रह कर लिये जाते हैं, पर अपनी खामियाँ, खराबियाँ ढूँढने के लिए किसी की रुचि नहीं होती। इतना ही नहीं, कोई वैसा सुझाता है तो बुरा लगता है। इस स्वभावगत दुर्बलता से लोहा लेकर जो अपनी कमजोरियों को स्वयं ढूँढते हैं, उन्हें स्वीकार करते हैं और सुधारने के लिए बार-बार असफल होने पर भी धैर्यपूर्वक जुटे रहते हैं उन्हें बहादुर ही कहा जाएगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

🔴 एक बार हमारा एक नौकर काशीनाथ बीमार हुआ। उसे प्लेग की गिल्टी निकल आई। वह चुपचाप अस्पताल को चला गया और रिश्तेदार को एक पत्र लिख दिया कि जज साहब को खबर न होने पावे, वरना वे मेरे लिए बहुत चिन्ता करेंगे। फिर भी मेरी पत्नी को किसी प्रकार पता चल गया और हम लोग उसकी सेवा सुश्रूषा करने अस्पताल नित्य जाने लगे। हमारे एक मित्र ने कहा-छोटे नौकर के लिए हाईकोर्ट के प्रधान जज को इतनी दौड़ धूम करना उचित नहीं। मैंने हँसते हुए कहा- जज होने से पहले मैं मनुष्य हूँ और मनुष्य का धर्म है कि अपने से छोटे व्यक्तियों की शक्ति भर सहायता करे।

🌹 जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे।

👉 आत्मवत् सर्व भूतेषु


🔴 यदि हम अपने से चन्द सवाल पूछें और जो उत्तर उन सवालों का हम दूसरों के लिए दें, उन्हें ही अपने ऊपर लागू करें तो हमें सच्चे नागरिक बनने में देर न लगे। यदि मुझ से कोई वस्तु माँग ले जाय तो मैं यह चाहता हूँ या नहीं, कि वह वापिस मिल जाय और वैसी ही अच्छी हालत में जिस हालत में मैंने दी थी? यदि मुझसे किसी ने कोई वायदा किया है तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि वह ठीक तरह से समय पर उसे पूरा करे? यदि मैं सड़क पर चलता हूँ तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि किसी के फेंके हुए केले के छिलके से मैं फिसल न पड़ूं और यदि फिसल पड़ूं तो कोई मेरी सहायता कर मुझे उठा दे और मेरी फिक्र करे न कि मेरा उपहास? मैं चाहता हूँ या नहीं, कि यदि मेरा बच्चा कहीं रास्ता भूल गया हो तो उसे कोई मेरे घर पहुँचा दे और उसे इधर-उधर भटकता न छोड़ दे? यदि मैं किसी सभा में जा रहा हूँ, तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि लोग इस प्रकार बैठे हों, कि मुझे भीतर जाकर बैठने की जगह हो और व्यर्थ एक तरफ भीड़ और दूसरी तरफ कुर्सियाँ खाली न हों? यदि किसी के घर मेरा निमन्त्रण है तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि मेरे पहिले पहुँचने वाले लोगों ने जूता इस तरह उतारा हो कि मुझे भी अपने जूतों को रखने की जगह मिल जाय?

🔵 थोड़े में यदि हम सदा यह याद रखें, कि जो हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वही दूसरे हम से चाहते हैं, जिससे उन्हें भी आराम और आशाइश मिले और यदि हम उसी के अनुसार कार्य करें तो हम सच्चे और अच्छे नागरिक फौरन बन सकते हें। चाहे हम कितने ही छोटे आदमी क्यों न हों, हम भी काफी हिस्सा देश के लिए सच्चा स्वराज्य प्राप्त करने में ले सकते हैं।

🔴 प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह आशा रखे कि उसके प्रति जो समुचित कर्तव्य दूसरों का है, वे उसका पालन करेंगे। जब हम सड़क पर चलते हैं, तो हमें इसका अधिकार है कि हमको समुचित सुविधा अन्य सब चलने वालों से मिले। पर हमको सदा भय रहता है कि हम पर कोई अपने मकान के ऊपर से कूड़ा फेंक देगा, कोई केले का छिलका इस तरह से फेंकेगा, कि हम उस पर से फिसल कर गिर जायेंगे, कोई साहब आगे से छाता इस तरह से कन्धे पर रखकर चलते होंगे, कि हमारी आँख में उसकी नोंक चुभ जायगी। ऐसा ही भय हम से अन्य भाइयों को रहता है। मेरी तो दृढ़ भावना है, कि जो केले का छिलका सड़क पर फेंकता है, या ठीक तरह से छाता लेकर नहीं चलता, वह स्वराज्य के रास्ते में रोड़ा अटकाता है और स्वराज्य के आने में देर कराता है।

🔵 रेल पर चलने वालों का भी यही अनुभव है कि खिड़की के बाहर न थूक कर लोग डब्बे के भीतर थूकते हैं, खाने-पीने के सकोरे पत्तल बाहर न फेंक, भीतर ही छोड़ देते हैं, जिससे दूसरे मुसाफिरों को तकलीफ होती है। जगह रहते भी रात को जो मुसाफिर गाड़ी में आते हैं, वे व्यर्थ ही इतना शोर मचाते हैं, दरवाजा इतने जोर से खोलते बन्द करते हैं, कि दूसरों को बेमतलब कष्ट पहुँचता है। कोई किसी को भीतर नहीं आने देता, आये हुए लोगों को बैठने नहीं देता, स्वयं उतरते समय दरवाजा खुला छोड़ जाता है। यदि हम केवल यह छोटा सा उसूल सदा याद रखें, कि हमें भी दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे साथ करें, तो हम ऐसी भूल न करेंगे जिसके कारण हम भरोसे के योग्य नहीं रह जाते।

🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1943/March.7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...