गुरुवार, 7 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 July 2016


🔴 वर्तमान ही हमारा है। हमें तो पहले आज की परवाह करनी चाहिए। यह सुंदर सुहावना आज, यह उल्लासपूर्ण आज ही हमारी अमूल्य निधि है। यह आज ही हमारे हाथ में है। यह हमारा साथी है। इस आज की ही प्रतिष्ठा कीजिए। आज के साथ खूब खेलिए, कूदिए, मस्त रहिए और इसे अधिकाधिक उत्साहपूर्ण और उल्लासपूर्ण बनाइए।

🔵 ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गतिविधियों पर-विचारधाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो। चाहे जिस स्तर की चिंतन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य ही चिंतन का आधार हो सकता है। यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।

🔴 नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। जैसे समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी। न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 July 2016


🔴 चिन्ता से मुक्ति का एकमात्र उपाय है-हर समय काम में लगे रहना। निठल्ले व्यक्ति को ही चिन्ता जैसी पिशाचिनी घेरती है। जो व्यक्ति कर्मरत है, प्रगतिशील है, चिन्ताएँ उसे किसी प्रकार भी नहीं घेर सकतीं। चिन्ता का जन्मस्थान एवं निवासस्थान दोनों ही में मनुष्य का चित्त होता है। यदि मनुष्य का चित्त किसी कार्य में व्यस्त रहे तो चिन्ता का जन्म ही न हो सके।

🔵 किसी भी व्यक्ति अथवा समाज की सभ्यता की गहराई का पता उनके उत्सवों, संस्कारों एवं समारोहों के समय ही चलता है। जिनके खुशी मनाने के तरीके सादे, सरल, शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण होते हैं, आज के युग में वे समाज ही सभ्य कहे जा सकते हैं।

🔴 उपासना का सार है- सर्वगुण संपन्न ईश्वर को अपना घनिष्ठतम जीवन सहचर अनुभव किया जाना और अपने शरीर, मन तथा अंतःकरण को ईश्वर अर्पण करके उस पर दिव्य सत्ता का अधिकार स्वीकार करना। जो इस स्तर की उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाय वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाय उसमें ईश्वरीय गौरव गरिमा की झाँकी मिलती हो।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 दुःखों का स्वागत कीजिये।


🔴 दुःख से लोग बहुत डरते हैं और चाहते है कि वह न आवे, फिर भी न चाहते हुए भी वह आ ही जाता है, इसमें महान ईश्वरीय प्रयोजन है। मनुष्य के अहंकार और दुर्भावों का शमन शोधन करने के लिए दुःख का आगमन ऐसी रामबाण औषधि की तरह साबित होता है जो पीने में कड़वी होते हुए भी व्याधि का नाश कर डालती है। जब नाना प्रकार की यंत्रणाएं, घोर दुःख, संकटों का अपार समूह उमड़ता चला आता है और बाहुबल कुछ काम नहीं करता, शक्तियाँ असमर्थ हो जाती हैं, तब मनुष्य सोचता है कि मुझसे भी ऊँची कोई शक्ति मौजूद है और उस शक्ति का विधान इतना प्रबल है जिसे मैं तोड़ नहीं सकता।

🔵 नास्तिकता से आस्तिकता की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, अहंकार से नम्रता की ओर ले चलने की क्षमता दुःखों में है। जो मनुष्य हजार उपदेशों से भी कुपथ पर चलने से बाज नहीं आते थे वे विपत्ति की एक करारी ठोकर खाकर तिलमिला गये और ठीक रास्ते पर आ गये। विपत्ति में ईश्वर का स्मरण आता है और अधर्म के दुखद परिणामों को देखकर सुपथ पर चलने की इच्छा होती है। कष्टों की खराद पर घिसे जाने के उपरान्त मनुष्य की बुद्धि, सावधानी, क्रियाशीलता सभी तेज हो जाती हैं। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं, वे विपत्तियों की खराद पर खूब रगड़-रगड़ कर घिसे गये हैं तब उनका उज्ज्वल स्वरूप दुनिया को दिखाई पड़ा हैं।
🔴 विपत्ति से डरने की कोई बात नहीं है, कष्टों में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जो अन्ततः हानिकर सिद्ध हो। एक पहुँचे हुए ईश्वर भक्त का कहना है कि “ईश्वर जिसे अपनी शरण में लेना चाहते हैं उसके पास दुख भेजते हैं ताकि वह मोह को छोड़कर प्रेम के, भक्ति के मार्ग पर पदार्पण करे।”

🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1943/October/v1.13

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...