बुधवार, 6 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 July 2016


🔴 आशा, विश्वास और परिवर्तन के अटल विधान में आस्था रखने के साथ समय रूपी महान् चिकित्सक में विश्वास रखिए। समय बड़ा बलवान् और उपचारक होता है। वह धैर्य रखने पर मनुष्य के बड़े-बड़े संकटों को ऐसे टाल देता है जैसे वह आये ही न थे। संकट तथा दुःख  देखकर भयभीत होना कापुरुषता है। आप ईश्वर के अंश हैं-आनंद स्वरूप हैं। आपको तो धैर्य, साहस, आत्म-विश्वास और पुरुषार्थ के आधार पर संकट और विपत्तियों की अवहेलना करते हुए सिंह पुरुषों की तरह ही जीवन व्यतीत करना चाहिए।

🔵 मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सामाजिक जीवन का अर्थ है- मिल जुलकर स्नेह, सौहार्द्रपूर्वक रहना। स्वार्थ एवं संघर्ष सामाजिक जीवन के प्रतिकूल भाव हैं। सफल सामाजिक जीवन तभी संभव है, जब उसका प्रत्येक सदस्य सौम्य, सहनशील और शान्त स्वभाव वाला हो। इस स्थिति में सब मिल-जुलकर रह सकते हैं और पारस्परिक सद्भावना, सहयोग के बल पर व्यष्टि एवं समष्टिगत उन्नति भी कर सकते हैं। इसके विपरीत जिस समाज के सदस्य स्वार्थी, क्रोधी, असहिष्णु और असहयोगी होते हैं वे समाज में पारस्परिकता के अभाव में यथास्थान पड़े-पड़े कष्ट-क्लेशों के बीच एड़ियाँ रगड़ा करते हैं।

🔴 बुरे विचारों से बचने के लिए अवांछनीय साहित्य का पढ़ना बंद कर देना अधूरा उपचार है। उपचार पूरा तब होता है, जब उसके स्थान पर सद्साहित्य का अध्ययन किया जाय। मानव मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह सकता। उसमें किसी न किसी प्रकार के विचार आते ही रहते हैं। बार-बार निषेध करते रहने से किन्हीं गंदे विचारों का तारतम्य तो टूट सकता है, किन्तु उनसे सर्वथा मुक्ति नहीं मिल सकती। अवांछनीय विचारों से पूरी तरह बचने का सबसे सफल उपाय यह है कि मस्तिष्क में सद्विचारों को स्थान दिया जाये। असद्विचारों के  रहने से बुरे विचारों को प्रवेश पाने का अवसर ही मिलेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...