गुरुवार, 9 जून 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 June 2016


🔵 किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

🌹 स्वामी विवेकानन्द

🔵 आदर्श विहीन उस नाविक की तरह है जिसने बिना पतवार के गहन तूफान में अपनी नाव खोल दी हो। उसे यह ज्ञान नहीं कि किधर जाना है? लक्ष प्राप्त करने के लिए हमें किसी आध्यात्मिक गुरु की स्थापना अवश्य करनी चाहिए।

🔴 कुछ व्यक्ति सोचते हैं, “हमें कौन पूछने वाला है? हम किस गणना में हैं? हमसे क्या होना जाना है?” इस प्रकार मनःस्थिति से वे अपनी तुच्छता तथा हीनता की कुत्सित ग्रन्थि को और सुदृढ़ करते हैं और कायरता दब्बूपन तथा घोर निराशा में निरत रहते हैं

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 2)


🔴 रोटी, साग, चावल, दाल का आहार मिला-जुला कर करते हैं। ऐसा नहीं होता कि कुछ समय दाल ही पीते रहे-कुछ शाक खाकर रहे, फिर चावल खाया करे और बहुत दिन बाद केवल रोटी पर ही निर्भर रहे। स्कूली पढ़ाई में भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास की पढ़ाई साथ चलती है, ऐसा नहीं होता कि एक वर्ष भाषा दूसरे वर्ष गणित तीसरे वर्ष भूगोल और चौथे वर्ष केवल इतिहास ही पढ़ाया जाय। धोती, कुर्ता, टोपी, जूता चारों ही पहन कर घर से निकला जाता है। ऐसा नहीं होता कि कुछ वर्ष मात्र जूता पहन कर रहे और पीछे जब धोती पहनना आरम्भ करें तो उतना ही पर्याप्त समझें तथा जूता, कुर्ता, टोपी को उपेक्षित कर दें। लिखने में कागज, कलम, स्याही और उँगलियों का समन्वित प्रयोग होता है। एक बार में एक ही वस्तु का प्रयोग करने से लेखन कार्य सम्भव न हो सकेगा। शरीर में पाँच तत्त्व मिलकर काम करते हैं और चेतन को पाँचों प्राण मिल कर गति देते हैं।

🔵 एक तत्त्व पर या एक प्राण पर निर्भर रहा जाय तो जीवन का कोई स्वरूप ही न बन सकेगा। भोजनालय में आग, पानी, खाद्य पदार्थ एवं बर्तन उपकरणों के चारों ही साधन चाहिए। इसके बिना रसोई पक सकना कैसे सम्भव होगा? आत्म-उत्कर्ष के लिए (1) अपनी अवांछनीयताओं को ढूँढ़ निकालना-(2) कुसंस्कारों के प्रति प्रबल संघर्ष करके उन्हें परास्त करना (3) जो सत्प्रवृत्तियाँ अभी स्वभाव में सम्मिलित नहीं हो पाई हैं उन्हें प्रयत्न पूर्वक सीखने का- अपनाने का प्रयत्न करना (4) उपलब्धियों का प्रकाश दीपक की तरह सुविस्तृत क्षेत्र में वितरित करना, यह चार कार्य समन्वित रूप से सम्पन्न करते चलने की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं चारों को तत्त्ववेत्ताओं ने आत्म-चिन्तन आत्म-सुधार आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के नाम से निरूपित किया है।

🔴 इन चारों प्रयोजनों को दो भागो में बाँट कर दो-दो के युग्म बनते हैं। एक को मनन दूसरे को चिन्तन कहते हैं। मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1977/January.7

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...