शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 4)

🔶 गौरव की, प्रतिष्ठा की, बड़प्पन की, सम्मान की सब कोई इच्छा करते है। पर कितने लोग हैं, जिनने यह सीखा हो कि अपना आदर्श एवं दृष्टिकोण महान रखने पर ही सच्ची और स्थिर प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जो भी काम करें उसमें अपने व्यक्तित्व की महानता की छाप छोड़ी जाय जिसके परिणाम में हमें सच्चा गौरव प्राप्त हो, इस बात को कौन सोचता है? आज तो लोग फैशन, श्रृंगार, अकड़, शान और शौकत, शेखी, अपव्यय, बहुसंचय, कोठी, मोटर, दावत, पार्टी जैसी बनावटों के आधार पर बड़े बनने की कोशिश कर रहे हैं।

🔷 काश, उन्हें कोई यह समझा देता कि यह बाल-क्रीड़ाऐं व्यर्थ हैं। जो भी काम करो उसे आदर्श, स्वच्छ, उत्कृष्ट, पूरा, खरा, तथा शानदार करो। अपनी ईमानदारी और दिलचस्पी को पूरी तरह उसमें जोड़ दो, इस प्रकार किये हुए उत्कृष्ट कार्य ही तुम्हारे गौरव का सच्चा प्रतिष्ठान कर सकने में समर्थ होंगे। अधूरे, अस्त-व्यस्त फूहड़, निकम्मे, गन्दे, नकली, मिलावटी, झूठे और कच्चे काम, किसी भी मनुष्य का सबसे बड़ा तिरस्कार हो सकते है, यह बात वही जानेगा जिसे जीवन विद्या के तथ्यों का पता होगा।

🔶 अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है। जिसे जीवन से प्रेम है वह अपने आपको सुधारता है, अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है। फलस्वरूप उसके सोचने और काम करने के तरीके ऐसे हो जाते है जिनके आधार पर महानता दिन-दिन समीप आती जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.6

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...