बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Oct 2016

🔵 मनुष्य कुसंस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह बात ठीक नहीं जचती। यह मनुष्य के संकल्प बल और विचारों के दृष्टिकोण को समझकर कार्य करने पर निर्भर है। महर्षि वाल्मीकि, संत तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका एवं अजामिल के प्रारंभिक जीवन को देखकर और आखिरी जीवन से तुलना करने पर यह स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है कि दुर्गुणी और पतित लोगों ने जब अपना दृष्टिकोण समझा और बदला तो वे क्या से क्या हो गये? चाहिए संकल्प बल की प्रबलता।

🔴 अपनी असलियत हम जितनी अच्छी तरह जान सकते हैं दूसरे उतनी नहीं। सो दोषों की निन्दा और उनके उन्मूलन की चेष्टा हमें अपने आप से आरंभ करनी चाहिए, क्योंकि अपने निकटतम समीपवर्ती हम स्वयं ही हैं। अपने ऊपर अपना जितना प्रभाव और दबाव है उतना और किसी पर नहीं, इसलिए यदि सुधारने का काम आरंभ करना हो तो ऐसे व्यक्ति से आरंभ करना चाहिए जो अपने अधिकतम निकट और अधिकतम प्रभाव, दबाव में हो, ऐसे व्यक्ति हम स्वयं ही हो सकते हैं।

🔵 प्रायः अखबारों में नाम और फोटो छपाने के लोभ में कई लोग सत्कर्मों का बहाना करते रहते हैं। यश मिलने की शर्त पर ही थोड़ी उदारता दिखाने वाले लोग बहुत होते हैं, परन्तु दया, करुणा, त्याग और परमार्थ की भावनाओं को चरितार्थ करने की महत्त्वाकाँक्षाएँ ही सच्ची और श्रेयष्कर महत्त्वाकाँक्षाएँ कही जा सकती हैं। यह वे आध्यात्मिक विभूतियाँ हैं जिन्हें पाकर मनुष्य स्वयं भी आनंद और संतोष लाभ करता है, साथ ही अपने समीपवर्ती समाज को भी सुख-शान्ति का आनंद देता है। व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं के पागलपन ने दुनिया का अनर्थ ही किया है,इन्हें त्यागा ही जाना चाहिए।

*🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...