शनिवार, 3 सितंबर 2016

👉 हृदय-मंदिर के अंदर संतोष 👉 In the Shrine of the Heart


🔴 जब कभी किसी दु:खद घटना से तुम्हारा मन खिन्न हो रहा हो, निराशा के बादल चारों ओर से छाए हों, असफलता के कारण चित्त दु:खी बना हुआ हो, भविष्य की भयानक आशंका सामने खड़ी हुई हो, बुद्धि किंकर्त्तवयविमूढ़ हो रही हो, तो इधर-उधर मत भटको। उस लोमड़ी को देखो, जो शिकारी कुत्तों से घिरने पर भाग कर अपनी गुफा में घुस जाती है और वहाँ संतोष की साँस लेती है।

🔵 ऐसे विषय अवसरों पर सब ओर से अपने चित्त को हटा लो और अपने हृदय-मंदिर में चले आओ। बाहर की समस्त बातों को बिलकुल भूल जाओ। पाप-तापों को द्वार पर छोड़ कर जब भीतर जाने लगोगे तो मालूम पड़ेगा कि एक बड़ा भारी बोझ, जिसके भार से गरदन टूटी जा रही थी, उतर गया और तुम बहुत ही हलके, रुई के टुकड़े की तरह हलके हो गए हो। हृदय-मंदिर में इतनी शांति मिलेगी, जितनी ग्रीष्म से तपे हुए व्यक्ति को बर्फ से भर हुए कमरे में मिलती है। कुछ ही देर में आनंद की झपकियाँ लेने लगोगे।

🔴 हृदय के इस सात्विक स्थान को ब्रह्मलोक या गोलोक भी कहते हैं क्योंकि इसमें पवित्रता, प्रकाश और शांति का ही निवास है। परमात्मा ने हमें स्वर्ग-सोपान सुख प्राप्त करने के लिए दिया है, किंतु अज्ञानतावश मनुष्य उसे जान नहीं पाते।

🌹 -अखण्ड ज्योति -मार्च 1941


👉 In the Shrine of the Heart

🔵 Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

🔴 You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.
🔵 The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

🌹 -Akhand Jyoti, March 1941

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