शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

👉 बादलों की तरह बरसते रहो

🔴 वे लोग अगले जन्म में दु:ख भोगेंगे जो किसी को कुछ नहीं देते और पैसे को जोड़कर जमा करते जाते हैं। जिसने अपने घर में दौलत के ढेर जोड़ रख हैं मगर उसका सदुपयोग नहीं करता उसे एक प्रकार का चौकीदार ही कहना चाहिए। उसका जीवन पृथ्वी के लिए भार रूप है जो वेश की परवाह किए बिना निरंतर धन के लिए ही हाय-हाय करते हैं। जो न तो खुद खा सकता है और न दूसरों को दे सकता, चाहे वह करोड़पति ही क्यों न हो, मामूली गरीब आदमी से उसमें कुछ विशेषता नहीं है। उचित-अनुचित तरीकों से पेट पर पट्टी बाँध कर जो धन जोड़ा या है, वह उसके किसी काम न आएगा, उसका उपयोग तो दूसरे ही करेंगे। वह मनुष्य बुद्धिमान् है, जिसने अपना धन शुभ कार्यों में खर्च कर दिया है। असल में वह बरसने वाले बादलों के समान है, जो आज खाली होता है, तो कल फिर भर जाएगा।

🔵 मिलनसारी, भलमनसाहत का व्यवहार और दूसरों के हितों का ख्याल रखना, ये ऐसे गुण हैं, जिनसे दुनिया अपनी हो सकती है। संसार उनको भुला नहीं सकता, जो अपने से छोटे और बड़ों के साथ शिष्टता का व्यवहार करते हैं।

🔴 कटुभाषी और निष्ठुर स्वभाव के मनुष्य का जीवन लोहे और काठ की तरह नीरस होता है चाहे वे भले ही आरी की तरह तेज हों। जिस कर्महीन मनुष्य को इतने लम्बे चौड़े विश्व में हँसने और मुस्कराने योग्य कुछ दिखाई नहीं देता और सारे दिन कुड़ कुढ़ता रहता है, उसे उस रोगी की तरह समझना चाहिए जिस दिन में भी नहीं दीखता। बद-मिज़ाज व्यक्ति के पास चाहे कितनी ही विद्या और सम्पत्ति क्यों न हों, वह उस दूध के समान निकम्मा है जो गन्दे पात्र में रखा होने से दूषित हो गया है।

🌹 -अखण्ड ज्योति -फरवरी 1943

👉 Generous Like the Clouds

🔵 Stingy fellows, who keep their resources only to themselves and remain apathetic to others’ sufferings, are in fact accounting sins for their future destiny. Those who have stocked heaps of wealth in their possession but never use it are mere ‘guards’ of money. Such fellows are burden on this earth that can do nothing for anyone. Even materialistically, they don’t enjoy anything; the thirst of gaining more, the worries and tensions of safeguarding the possession and the miserly attitude do not let them live in peace; they neither eat well nor can give anything to others. Despite having millions or billions of riches, they remain poor, beggars… Thirst for more and more of selfish possession does not even let one see what are the right or wrong means of piling the stocks of wealth. Prosperity earned by unfair means cannot let one prosper… One dies empty handed and later one all that ‘dead property’ possessed by him does no good to even to those who grabs it afterwards…

🔴 On the contrary, those who earn honestly and spend magnanimously and wisely in good, constructive and auspicious activities are always prospering. They are like clouds, which enshower generously; even if emptied today, the clouds are filled again and return back tomorrow with same dignity.

🔵 Integrity, benevolence, caring and helping sociability – are virtues of greatness, which can make the entire world your own. No one can forget the warmth of meeting such amicable personalities. But, the selfish fellows, howsoever talented and affluent they might be, remain aloof and virtually isolated; their state is like that of milk kept in a dirty pot, which is thrown without use…

🌹 -Akhand Jyoti, Feb. 1943

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