शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 Sep 2016


🔴 उत्साह जीवन का धर्म है। अनुत्साह मृत्यु का प्रतीक है। उत्साहवान् मनुष्य ही सजीव कहलाने योग्य है। उत्साहवान् मनुष्य आशावादी होता है। उसे सारा विश्व आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है। विजय, सफलता और कल्याण सदैव आँख में नाचा करते हैं, जबकि उत्साहहीन हृदय को अशान्ति ही अशान्ति दिखाई देती है।

🔵 मनुष्यता के गुणों से हीन प्राणी चाहे रावण से धनवान्, शुक्राचार्य से विद्वान्, हिरण्यकश्यपु से पराक्रमी, कंस से योद्धा, मारीच से मायावी, कालनेमि से कूटनीतिज्ञ, भस्मासुर से शक्तिशाली क्यों न हो जावें, पर वे न अपने लिए, न दूसरों के लिए-किसी के लिए भी शान्ति का कारण न बन सकेंगे। यह समृद्धि अयोग्य लोगों के, कुपात्रों के हाथ में जितनी बढ़ेगी उतना ही क्लेश बढ़ेगा, अशान्ति की कालिमा घनी होगी।

🔴 ईश्वर को प्रसन्न करने का उपाय केवल यही है कि अपने से निःस्वार्थ भाव से जो भी सेवा, त्याग, परोपकार हो सके, वह किया जाय। संसार क्या करता है? संसार क्या कहेगा? यह सब व्यर्थ की बातें हैं। आत्मा क्या कहेगी? ईश्वर क्या कहेगा? यही मुख्य बात है। यही ईश्वर की प्रसन्नता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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