रविवार, 28 अगस्त 2016

👉 कर्म या पाखंड

🔴 कार्य को आरंभ न करने मात्र से व्यक्ति निष्कर्मावस्था का आनंद प्राप्त नहीं करता। शरीर के द्वारा निष्क्रिय हो गए, तो क्या लाभ, क्योंकि बंधन और मोक्ष का कारण तो मन है। मन के निष्क्रिय बनाना है। मन की निष्क्रियता है-कर्म और कर्मफल से अनासक्त रहना।

🔵 आलसी बनकर बैठे मत रहो। फल में अपना अधिकार ही नहीं। उद्योग करने पर भी फल प्राप्त होगा, यह निश्चित नहीं। फल प्राप्त हो भी, तो वह प्रारब्ध से होता है, उद्योग उसका कारण नहीं, ऐसा समझकर उद्योग करना ही मत छोड़ दो। कर्म करना तुम्हारा कर्त्तव्य है, अत: तुम्हें कर्म तो करना ही चाहिए, क्योंकि तुम कर्म को छोड़ नहीं सकते, कर्म करने के लिए विवश हो।

🔴 ``नकश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्म-कृत्। कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:।।
कोई उत्पन्न हुआ प्राणी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों से विवश होकर गुणों द्वारा उससे कर्म कराया ही जाता है। सभी इस प्रकार प्रतिक्षण कर्म करते ही रहते हैं। चाहे हम इंद्रियों को रोककर कर्म करने से विरत भी रख सकें, पर मन तो मानने से रहा उसकी उधेड़बुन तो चला ही करेगी। फिर इस प्रकार इंद्रियों से कर्म न करना कोई अच्छा तो है नहीं। जो मूर्खबुद्धि पुरुष कर्मेंद्रियों को कर्मों से रोककर मन के द्वारा विषयों का चिंतन करता है, वह पाखंडी कहा जाता है।

🌹 -अखण्ड ज्योति-अगस्त 1940

👉 Renunciation of Karma is Self-Deception
🔵 Often people misinterpret the preaching of the holy Gita and Vedanta and regard the state of inaction as that of detachment and soul-realization. But this is mere delusion, idleness and escapism. Making the body inactive or renouncing the family and duties does not serve any purpose of spiritual ascent. What is important is the liberation of the mind from all ego, expectations and selfish attachments. You should perform all your duties, do all your work at your level best but be detached from the end-results.

🔴  Don’t expect the results of your actions to be as per your will or imagination. But don’t leave your actions (karmas) thinking that every thing will happen as per your destiny. You can’t live even for a single moment without any karma – be that physical or mental. You are born do transact your duties. This is what is implied in the following hymn:

🔵 “Na Kaschitksanamapi Jatu Tisthtyakarma-Krat ! Karyate Hyavasah Karma Sarvah Prakratijairgunaih !!”
The system of Nature is such that it triggers every being, every particle, to act as per its natural tendencies. We might prevent the actions of our body or the sense organs for sometime; but what about the flow of thoughts and the impulses of unconscious mind? Those who attempt such superficial renouncement and try to evade from duties, actions suffer more agility and turbulence of desires and intrinsic tendencies in the mind… They are fake and self-cheaters.

🌹 -Akhand Jyoti, Aug 1940

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