मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 आवेशग्रस्त न रहें, सौम्य जीवन जियें (भाग 3)


🔴 भय के वास्तविक कारण कम और काल्पनिक अधिक होते हैं। भूत, चोर, साँप, बिच्छू आदि की उपस्थिति एवं आक्रामकता के कल्पित चित्र इतना परेशान करते हैं मानो वे सचमुच ही सामने उपस्थित हों और बस हमला ही करने जा रहे हैं।
🔵 कोई व्यक्ति आक्रमण करने वाला हो, षडयन्त्र रच रहा हो, जादू टोना करके हानि पहुँचाने जा रहा हो ऐसा डर अकारण ही उठता रहता है। आमतौर से ऐसा होता नहीं है। ऐसी दुर्घटनाएँ कभी-कभी ही घटित होती हैं। उनमें से 90 प्रतिशत आशंकाएँ काल्पनिक पाई जाती हैं। रात के अन्धेरे में अविज्ञात का डर लगता है। प्रकाश होने पर वस्तुस्थिति का पता चल जाता है और साथ ही डर भी नहीं रहता। एकाकी रास्ता चलते मनुष्य अपनी अशक्तता की अनुभूति से डरता है। कोई साथ चलने लगे तो वह अपडर भी नहीं रहता।

🔴 श्मशान में भूत-पलीतों की उपस्थिति मान्यता क्षेत्र पर छाई रहती तो उधर से गुजरते हुए दिल धड़कता है। किन्तु देखा यही गया है कि उसी क्षेत्र में काम करने वाले या बसने वाले लोग बिना किसी प्रकार का जोखिम उठाये निश्चिन्तता पूर्वक समय बिताते रहते हैं। भय का बाहरी कारण कम और भीतरी अधिक होता है। अन्धेरे में झाड़ी भी भूत की तरह डरावनी लगती है।

🔵 दुर्बल के लिए दैव भी घातक होता है। जो हवा आग को जलने में सहायता करती है वही कमजोर दीपक को बुझा भी देती है। बढ़ती हुई ज्वाला के लिए पवन सहायता करता है और देखते-देखते दावानल बना देता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1984 मई पृष्ठ 40
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1984/May.40

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