मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 आवेशग्रस्त न रहें, सौम्य जीवन जियें (भाग 2)


🔴 शहरी आबादी की पिच-पिच, गन्दगी, शोर व्यस्तता एवं अभक्ष्य-भक्षण के कारण लोग तनावजन्य रोगों से ग्रसित होते हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत दृष्टिकोण, स्वभाव एवं जीवन-यापन का क्रम भी इस विपत्ति को बढ़ाने में बड़ा कारण बनता है। क्रोध, आवेश, चिन्ता, भय, ईर्ष्या, निराशा की मनःस्थिति ऐसी उत्तेजना उत्पन्न करती है जिसके कारण तनाव रहने लगे। इस स्थिति में नाड़ी संस्थान और माँस पेशियों के मिलन केन्द्रों पर ‘सोसिटिल कोलेन’ नामक पदार्थ बढ़ने और जमने लगता है।

🔵 कार्बन और कोगल की मात्रा बढ़ने से लचीलापन घटता है और अवयव अकड़ने जकड़ने लगते हैं। यह एक प्रकार की गठिया के चिन्ह हैं जिसके कारण हाथ पैर साथ नहीं देते और कुछ करते-धरते नहीं बन पढ़ता। इन दिनों हर स्तर का व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से घिरा रहता है जिससे उसका मनःसंस्थान खिन्न उद्विग्न रहने लगे।

🔴 बच्चे अभिभावकों से समुचित स्नेह प्राप्त नहीं कर पाते और असुरक्षा अनुभव करके निराश एवं खीजते रहते हैं। युवा वर्ग के सामने कामाचार की ललक- रोजगार की अनिश्चितता तथा पारिवारिक सामंजस्य की समस्याएँ उद्विग्नता बनाये रहती हैं। यार दोस्तों की धूर्तता से भी वे परेशान रहते हैं। बूढ़ों की शारीरिक अशक्तता, रुग्णता ही नहीं परिजनों द्वारा बरती जाने वाली अवमानना भी कम कष्टदायक नहीं होती। वे कमा तो कुछ सकते नहीं। बेटों के आश्रित रहते हैं। अपनी कमाई पर से भी स्वामित्व खो बैठते हैं।

🔵 मित्रता भी इस स्थिति में किसी को हाथ नहीं लगती। फलतः वे एकाकीपन से ऊबे और भविष्य के सम्बन्ध में निराश रहते हैं। मौत की समीपता अधिकाधिक निकट आती प्रतीत होती है। किसी अविज्ञात के अन्धकार में चले जाने और दृश्यमान संसार सम्बन्ध छूट जाने की कल्पना भी उन्हें कम त्रास नहीं देती। इन परिस्थितियों में यदि तनाव का आक्रमण हर किसी पर छाया दीखता है तो इसमें आश्चर्य भी क्या है?

🔴 संवेगों में स्नेह, क्रोध और भय प्रमुख हैं। इनकी विकृति मोह, आक्रमण एवं हड़कम्प के रूप में देखी जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1984 मई पृष्ठ 39
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1984/May.39

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