शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 AUG 2016


🔴 बुराइयों का दोष मन के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं। मनुष्य स्वयं इसका अपराधी होता है और इसी में उसका कल्याण है कि वह अपना दोष स्वीकार कर ले और उसका परिमार्जन करने का प्रयत्न करे। जिस प्रकार मन को उसने बलात् पूर्वक अधोगामी बनाया है, उसी प्रकार उसे सन्मार्गगामी बनाने का भी प्रयत्न करें।

🔵 मनुष्य के साध्य, सुख और शान्ति का निवास कामनाओं, उपादानों अथवा भोग-विलास में नहीं है। वह कम से कम कामनाओं, अधिक से अधिक त्याग और विषय-वासनाओं के विष से बचने में ही पाया जा सकता है। जो निःस्वार्थी, निष्काम, पुरुषार्थी, परोपकारी, संतोषी तथा परमार्थी हैं, सच्ची सुख-शान्ति के अधिकारी वही हैं। सांसारिक स्वार्थों एवं लिप्साओं के बंदी मनुष्य को सुख-शान्ति की कामना नहीं करनी चाहिए।

🔴 महानता कोई सुख नहीं है जैसा कि लोग समझते हैं। यह मनुष्य की जीवनकालीन सेवाओं, लोकमंगल की कामनाओं, प्रयत्नों, कष्टों, बलिदानों और ध्येयधीरता का प्रमाण पत्र है, जो प्रायः उसके दिवंगत हो जाने के बाद संसार द्वारा घोषित किया जाता है। जीवनकाल में ही सफलता का हठ लेकर चलने वालों के लिए यही उपयुक्त है कि वे या तो अपना कदम पीछे हटा लें अथवा अपनी मनोवृत्ति में सुधार कर लें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...