शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 AUG 2016


🔴 भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाय अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिंतन को ही अपनाया।

🔵 जैसे को तैसा-यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जवाब गाली से और घूँसे का जवाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंद्व युद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है। उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे नेकी कर कुएँ में डाल की नीति अपनाते हैं।

🔴 अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं के बारे में हमें विवेकपूर्ण बुद्धि से सोचना चाहिए कि वे कितनी यथार्थ और कितनी उपयोगी है? कहीं उन्होंने हमें भुलावे में तो नहीं डाल रखा है? वे हमें जीवन के सही रास्ते पर ले जाती हैं या हमें पथ भ्रष्ट कर रही हैं। किन्हीं प्रलोभनों के पीछे तो हम नहीं दौड़ रहे हैं? हमारी आकाँक्षाओं के पीछे कोई स्वार्थ बुद्धि तो काम नहीं कर रही? महत्त्वाकाँक्षाएँ यदि निकृष्ट स्तर की हों तो उन्हें त्याग देना चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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