मंगलवार, 9 अगस्त 2016

👉 आत्मबोध का अभाव ही खिन्नता (भाग 1)


🔵 स्वाभाविक प्रसन्नता खोकर अस्वाभाविक खेद, दुःख, किस बात का? रंज किस निमित्त? विचार करने पर प्रतीत होगा कि खिन्नता सिर पर लादने के वैसे कारण हैं नहीं जैसे कि समझ गये हैं।

🔴 घाटा कितनी दौलत का पड़ा। यह हिसाब लगाने से पूर्व देखना यह होगा कि जब आये थे तब क्या−क्या वस्तुऐं साथ थीं और जब विदाई का दिन सामने होगा तब क्या−क्या साथ जाने वाला है। जब दोनों परिस्थितियों में खाली हाथ ही रहना है तो थोड़े समय के लिए जो वस्तुएँ किसी प्रकार हाथ लगीं उनके चले जाने पर इतना रंज किस निमित्त किया जाय, जिससे प्रसन्नता भरे जीवन का आनन्द ही हाथ में चला जाय?

🔵 जिन वस्तुओं के चले जाने का रंज है वे कुछ समय पहले दूसरों के हाथ में थीं। जब हाथ आई तब इस बात की किसी ने कोई गारण्टी नहीं दी थी कि यह सदा सर्वदा के लिए अपने पास रहेगी। आज अपने हाथ, कल दूसरे के हाथ−वस्तुओं का यही क्रम है। कुछ समय के लिए हाथ आना और देखते−देखते दूसरे के हाथ चले जाना, विश्व व्यवस्था के इस क्रम में स्थायित्व की कल्पना करना यह भ्रम मात्र है। धन की हानि होते देखकर रुदन करना, अपने अनजानपन के अतिरिक्त और है क्या? जो अपने हाथ आया था वह दूसरे के हाथ खाली कराकर वह खिलौना दूसरों के हाथ खेलने के लिए थमा दिया गया तो इसमें क्या अनहोनी बात हो गई?

🔴 स्वजन सम्बन्धियों में से कुछ मृत्यु के मुख में चले गये अथवा अब जाने वाले हैं। इसमें अनहोनी क्या हुई? अपना शरीर जा रहा है या जाने वाला है इसमें भी प्रवाह क्रम ही समझा क्यों न जाय? जब जन्म लिया था तब कितने ही स्वजन सम्बन्धियों से नाता तोड़कर इस देह में आ गया था। अब उसी प्रकार इस देह से सम्बन्ध तोड़कर अन्य देह में प्रवेश करने का अवसर आ गया तो रुदन की क्या बात? नये शरीर बदलते रहना कपड़े बदलने के समान है। जो स्वाभाविक है। उसमें अनहोनी क्या हुई?

🌹 अगले अंक के समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1985 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1985/March.26

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