रविवार, 31 जुलाई 2016

👉 उदात्त वृत्तियों का अभिवर्द्धन


🔵 देखा गया है कि जो सचमुच आत्म-कल्याण एवं ईश्वर प्राप्ति के उद्देश्य से सुख सुविधाओं को त्याग कर घर से निकले थे, उन्हें रास्ता नहीं मिला और ऐसे जंजाल में भटक गये, जहाँ लोक और परलोक में से एक भी प्रयोजन पूरा न हो सका। परलोक इसलिए नहीं सधा कि उनने मात्र कार्य कष्ट सहा और उदात्त वृत्तियों का अभिवर्द्धन नहीं कर सके। उदात्त वृत्तियों का अभिवर्द्धन तो सेवा-साधना का जल सिंचन चाहता था, उसकी एक बूँद भी न मिल सकी।

🔴 पूजा-पाठ की प्रक्रिया दुहराई जाती रही, सो ठीक, पर न तो ईश्वर का स्वरूप समझा गया और न उसकी प्राप्ति का आधार जाना गया। ईश्वर मनुष्य के रोम-रोम में बसा है। स्वार्थपरता और संकीर्णता की दीवार के पीछे ही वह छिपा बैठा है। यह दीवार गिरा दी जाय तो पल भर में ईश्वर से लिपटने का आनन्द मिल सकता है। यह किसी ने उन्हें बताया होता तो निस्सन्देह इन तप, त्याग करने वाले लोगों में से हर एक को सचमुच ही ईश्वर मिल गया होता और वे सच्चे अर्थों में ऋषि बन गये होते।

🌹 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम, वांग्मय 66 पृष्ठ 1.33


👉 Development of eminent nature and character

🔵 It is often observed that people who abandoned their comfortable family life and became monks to genuinely seek their own spiritual wellbeing and to realize the Divine didn’t just fail to fulfill their aims but got entrapped in such a tricky situation wherein they could accomplish neither the worldly nor the otherworldly aims. The reason why they couldn’t realize the otherworldly objective is that they only endured physical hardships but couldn’t actually manage to cultivate eminent thinking, practices and conduct which essentially require one to undertake the task of serving the humanity and mould their character accordingly to be able to fulfill it.

🔴 All they did was to keep performing rituals and reading scriptures. There is nothing wrong in doing so but they essentially failed to understand the profound manifestation of God and the ways to attain it. The Divine actually dwells within ourselves but remains unseen, being obscured by a wall of selfishness and lack of magnanimity. As soon as that wall is pulled down, one would be able to experience the bliss of the God within. Had someone reminded them about this truth, they would have certainly realized the God and become Rishis (sages) in real sense.

🌹 Pt. Shriram Sharma Aacharya
🌹 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama, Vangmay 66 Page 1.33

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