रविवार, 31 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 July 2016


🔴 पने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है वह है-दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्ति यों कभी किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है, जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

🔵 भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है- जैसी मान्यताएँ विपत्ति में असंतुलित न होने एवं संपत्ति में अहंकारी न होने के लिए एक मानसिक उपचार मात्र हैं। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने से तो व्यक्ति कायर, अकर्मण्य एवं निरुत्साही हो जाता है।

🔴 प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती।  वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर और चाणक्य जैसे कुरूप को  प्राप्त होती है। उसके अनुशासन में जो आ जाता है, वह बिना भेदभाव के उसका वरण कर लेती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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