शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 July 2016


🔴  दुष्कर्म करना हो तो उसे करते हुए कितनी बार विचारों और उसे आज की अपेक्षा कल-परसों पर छोड़ों, किन्तु यदि कुछ शुभ करना हो तो पहले ही भावना तरंग को कार्यान्वित होने दो। कल वाले काम को आज ही निपटाने का प्रयत्न करो। पाप तो रोज ही अपना जाल लेकर हमारी घात में फिरता रहता है, पर पुण्य का तो कभी-कभी उदय होता है, उसे निराश लौटा दिया तो न जाने फिर कब आवे।

🔵  दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं-अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा डाले? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो आत्म-सुधार के लिए, आत्म-निर्माण के लिए और आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

🔴  पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान् वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ साँप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्ज्वल जीवन का नाश कर सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 आदेश की विचित्र पालना, एक उलझन मे एक सुलझन मे

🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये? 🔶 महात्मा जी ने...