बुधवार, 27 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 July 2016


🔴 सत्कर्मों की पुण्य प्रवृत्ति कभी-कभी ही पैदा होती है। ऐसा उत्साह भगवान् की प्रेरणा और पूर्व संचित शुभ कर्मों का उदय होने पर ही जाग्रत् होता है, अन्यथा मनुष्य स्वार्थ और पाप की बातें सोचने में ही दिन गुजारता रहता है। इसलिए परमार्थ की पुण्य प्रवृत्तियाँ जब कभी उत्पन्न हों, तब कार्यान्वित करने के लिए साहस का प्रयोग ही कर डालना चाहिए।

🔵 संसार की सेवा का एक रूप अपनी सेवा भी माना गया है। अपनी सेवा से तात्पर्यपने शरीर मात्र की सेवा से नहीं है, न भोग-विलास और सुख-साधनों में लगा रहना ही सेवा है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है। अपने सुधार द्वारा हम जितना-जितना अपने को सुधारते चलेंगे, उतनी-उतनी ही समस्त संसार की सेवा होती चलेगी। हम सब इस विराट् विश्व की एक इकाई हैं। इसलिए अपनी सेवा भी संसार की सेवा ही कही जाएगी।

🔴 पुस्तकालय सच्चे देव मंदिर हैं। उनमें महापुरुषों की आत्माएँ पुस्तकों के रूप में प्रतिष्ठित रहती हैं। सत्संग के लिए पुस्तकालयों से बढ़कर विद्वान् और निर्मल चरित्र व्यक्ति दूसरा नहीं मिल सकता। अपने वंशजों के लिए एक उत्कृष्ट पुस्तकालय से मूल्यवान् वस्तु और कुछ हो ही नहीं सकती। उत्तराधिकार में और कुछ छोड़ें अथवा नहीं, पर एक अच्छे प्रेरणाप्रद पुस्तकालय की घर में स्थापना करके उस धरोहर को बच्चों, वंशजों के लिए छोड़ ही जाना चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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