सोमवार, 25 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 July 2016


🔴 भोगेच्छा को प्रेम कहना एक बहुत बड़ी प्रवंचना है। प्रेम तो आत्मा में ही हो सकता है और भोग शरीर का किया जाता है। इसलिए जिनके प्रेम के पीछे भोग की लालसा छिपी है, उनकी दृष्टि शरीर तक ही है। आत्मा का भाग नहीं हो सकता। वह स्वतंत्र है, वह किसी बंधन में नहीं आती।

🔵 आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्म-गौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिए आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्न चित्त से सह सकने की दृढ़ता का नाम आत्मबल है।

🔴 सतयुग और कुछ नहीं, मानवीय आस्थाओं में, मान्यताओं में, गतिविधियों में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के समुचित समावेश की प्रतिक्रिया मात्र है। समाज का निर्माण उच्च आदर्शों पर आधारित होगा और व्यक्ति अपनी मानवीय उत्कृष्टता का गौरव अनुभव करते हुए तदनुरूप आचरण करेगा तो इस संसार में सुख-शान्ति की अजस्र धारा बहती ही रहेगी। अभाव, कष्ट, क्लेश, संघर्ष, द्वेष, दुर्भाव और शोक-संताप का तब कोई कारण ही शेष न रहेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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